*INDIA CRIME NEWS प्रेमचंद का साहित्य आज भी सामाजिक चेतना का सशक्त आधारः प्रो. गुप्ता*

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*INDIA CRIME NEWS प्रेमचंद का साहित्य आज भी सामाजिक चेतना का सशक्त आधारः प्रो. गुप्ता*
श्रीनगर। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग तथा अजीमजी प्रेमजी फाउंडेशन, श्रीनगर के संयुक्त तत्वावधान में कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर एक विचार संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में प्रेमचंद के जीवन, साहित्य और उनके विचारों की समकालीन प्रासंगिकता पर विस्तार से चर्चा की गई।
कार्यक्रम में अंग्रेजी विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. मोनिका गुप्ता ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य केवल हिंदी का नहीं, बल्कि भारतीय समाज की संवेदना और मानवीय मूल्यों का प्रतिनिधि साहित्य है। उनके पात्र आज भी सामाजिक असमानता, नैतिक संघर्ष और मानवीय करुणा का जीवंत दस्तावेज प्रस्तुत करते हैं।
मुख्य नियंता प्रो. दीपक कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि प्रेमचंद ने साहित्य को सामाजिक परिवर्तन का प्रभावी माध्यम बनाया। उनका लेखन समाज में समानता, न्याय और मानवीय गरिमा की स्थापना का संदेश देता है, जो वर्तमान समय में और अधिक प्रासंगिक हो गया है।
हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभागाध्यक्ष प्रो. मंजुला राणा ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य भारतीय जीवन-दर्शन, लोकचेतना और सामाजिक यथार्थ का प्रामाणिक दस्तावेज है। नई पीढ़ी को उनके साहित्य से मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक उत्तरदायित्व और नैतिक मूल्यों की प्रेरणा ग्रहण करनी चाहिए। संगोष्ठी के दौरान शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने प्रेमचंद के जीवन एवं साहित्य पर अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर प्रेमचंद के साहित्य पर आधारित प्रश्नोत्तरी एवं उनके विचारों पर गहन मंथन भी किया गया, जिसमें प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।
अजीमजी प्रेमजी फाउंडेशन के प्रतिनिधि संजय एवं मीमांसा ने भी अपने विचार रखते हुए कहा कि प्रेमचंद का साहित्य शिक्षा, सामाजिक न्याय और मानवीय मूल्यों को सुदृढ़ करने का महत्वपूर्ण माध्यम है तथा आज के समाज में उनकी वैचारिक विरासत नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है। कार्यक्रम के अंत में हिंदी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. कपिल पंवार ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि तकनीकी और उत्तर-साक्षर युग में भी साहित्य की प्रासंगिकता बनी हुई है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल माध्यमों के बढ़ते प्रभाव के बीच प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों की मानवीय दृष्टि समाज को संवेदनशील और विवेकशील बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कार्यक्रम का सफल संचालन हिंदी विभाग की शोधार्थी पीअंजलि ने किया। संगोष्ठी में हिंदी, अंग्रेजी एवं संस्कृत विभाग के शोधार्थियों सहित विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के छात्र-छात्राओं ने सहभागिता की।

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